चाय की सबसे पुरानी तस्वीर मेरे ज़ेहन में बचपन के उन दिनों की है, जब सुबह उठते ही हम भाई-बहन कच्चे चूल्हे के चारों ओर बैठ जाते थे। दो कच्चे चूल्हे होते थे, और सर्दी के दिनों में पिताजी और माताजी दोनों एक-एक चूल्हे के पास बैठे होते थे। हमारे उठने तक चाय बन चुकी होती थी, और चाय की भगोनी अंगारों पर रखी होती थी।
मुझे उस चाय का स्वाद कभी पता नहीं चला, क्योंकि वह चाय हमारे लिए नहीं थी। हमें तो रात की बची बाजरे की एक रोटी को दूध में चूरकर खिला दिया जाता था, जो शाम तक सारे विटामिन और प्रोटीन की कमी महसूस नहीं होने देती थी। लेकिन उस चाय का कलर याद है। ज्यादा देर उबलने से चाय की पत्तियों का लाल रंग काला-सा होने लगता है, काफी काला। पिताजी को खेत या लकड़ी के काम में हाड़-तोड़ मेहनत करनी होती थी, तो उन्हें कड़क चाय चाहिए होती थी। माताजी को शायद उतनी कड़क चाय पसंद नहीं थी, मगर भारतीय नारी, जिसके पति परमेश्वर खुद चाय बनाकर दे दें, वह शायद ही मना कर पाए।
थोड़ा बड़ा होकर जब शहर आया, तो कॉलेज खत्म होते-होते थोड़ी-बहुत चाय पीने लगा। चाय के शौकीन और चाय के बहुत ज्यादा शौकीन लोगों से मिलना हुआ। इन्हीं मुलाकातों में पता चला कि हमारे यहां चाय सिर्फ पेय पदार्थ नहीं है। वह भावना है, जीवन का दर्शन है, संघर्ष है, और कुछ लोगों के लिए तो जीवन का अंतिम सत्य भी है।
आदमी सुबह उठकर चाय पीता है और उसे लगता है कि उसने भारतीय सभ्यता, संस्कृति और जीवन-दर्शन से सीधा संवाद कर लिया, जैसे बुद्ध की तरह निर्वाण पा लिया हो। चाय का गज़ब शौकीन आदमी हर बार चाय पीते हुए एक ऐसी चाय की टपरी को याद कर ही लेता है, जहां उसे ब्रह्मांड की सबसे सर्वश्रेष्ठ चाय मिली थी। वह अमृत बनाने का रहस्य स्वयं ब्रह्मा जी ने नारद को, नारद जी ने ऋषि बाबूलाल को दिया, जो आजकल शहर के उस चौराहे पर टपरी लगाते हैं।
लेकिन मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि चाय नामक यह पेय पदार्थ अनावश्यक रूप से महिमामंडित है। जिन उबले हुए पत्तों का काम नींद उड़ाना था, उन्हें अपने सिरदर्द, झगड़े, थकान, टूटे दिल और उधार की चिंता दूर करने वाली रामबाण औषधि बना देना थोड़ा गलत, बल्कि ज्यादा ही गलत लगता है।
मैंने यह बात बड़े अदब से कुछ दिन पहले दोस्तों से कही, तो तरह-तरह के विचार सामने आए। किसी ने मुझे राष्ट्र-पेय-द्रोही, किसी ने मूढ़ अज्ञानी और किसी ने ब्लैक कॉफी के चोंचलों में फंसा बहरूपिया करार दिया। मैं इन्हें कोई दोष नहीं देता। इस वार्तालाप से एक नई बात समझ आई, और वह है चाय का उबाल।
चाय का उबाल आदमी को अपने जीवन के उबाल जैसा लगता है। ऐसा उबाल, जिसके बिना चाय बन ही नहीं सकती। या यूं कहें कि बिना हार्ड वर्क के, बिना मेहनत के, बिना शरीर को तोड़े, बिना सिर को फोड़े और टूटे हाथ-पैर को जोड़कर फिर से तोड़े, जीवन में कहां सुख मिलता है। चाय का स्वाद तो उबाल से ही आता है।
ऐसा मैं खुद नहीं कहता। ऐसा हमने मान लिया है। हम अपनी थकान को उपलब्धि समझ बैठे हैं। अपने तनाव को गंभीरता मान बैठे हैं। अपनी अव्यवस्था को तपस्या घोषित कर चुके हैं। और अपनी असफलता को इतने गर्व से पहनते हैं, जैसे भारत रत्न मिल गया हो।
ज़ख़्म थे, सो दिखा दिए हमने,
इल्म क्या था, बता न पाए हम।
(मैं खुद चाय इतनी नहीं पीता, लेकिन हाल ही के इंडिया यस्टरडे मैगज़ीन के सर्वे के अनुसार, मैं ठीक-ठाक चाय बनाना जानता हूं। 53% लोगों ने इस बात का समर्थन किया है, 42% लोगों को एसिडिटी थी, इसलिए वे निष्पक्ष मत देने की संवैधानिक स्थिति में नहीं थे। बाकी 5% लोगों ने नया-नया ग्रीन टी पीना शुरू किया है।)
तो चाय के महान विचारकों ने चाय के उबाल का जो महिमामंडन किया है, वह उनकी खुद की कोई बड़ी दार्शनिक खोज नहीं है। यह भारतीय जनमानस के जीवन-दर्शन का एक हिस्सा है। भगवान महावीर के दर्शन में तपस्या को निर्वाण का परम साधन माना गया। उपनिषदों और महाकाव्यों की कहानियों में देवता और असुर घोर तप करके सिद्धि प्राप्त करते थे और ब्रह्मांड पर राज करते थे। कृष्ण स्वयं जेल में जन्म लेते हैं, प्रभु राम वनवास सहते हैं, गांधी पैदल चलते हैं, मोदी जी अठारह घंटे काम करते हैं और मेरे यहां भी कूलर में आज पानी नहीं है।
इसलिए अज्ञानी लोगों ने जीवन में महानता का एकमात्र साधन उबाल को मान लिया। अब हम उम्मीद कर बैठते हैं कि हमने इतना तप सहा है, इतने संघर्ष किए हैं, तो लोगों को हमारे आगे सिर झुकाना ही चाहिए, इज्जत देनी ही चाहिए। ओशो के अनुसार, भोगी से बड़ा भोगी तो वह योगी है, जो चाहता है कि लोग उसको सम्मान का भोग इसलिए चढ़ाएं, क्योंकि वह योगी है, त्यागी है।
जब साधु-भेष में योगी आपसे इतनी उम्मीद करता है, तो आम आदमी भी आम उम्मीद तो करेगा ही न। जैसे आप रेल में बैठे हों और कोई आदमी भागकर रेल में चढ़ा हो, सांस फूल रही हो, तो वह उम्मीद करेगा कि आप उसे अपनी सीट दे दें। और अगर बातचीत शुरू कर दो, तो वह बता देगा कि उसके बड़े ने उसके साथ बहुत गलत किया है, नहीं तो वह आज रेल में बिना टिकट यात्रा को मजबूर नहीं होता। सोचो, उसने चाय इतनी ज्यादा उबाली है, लेकिन घर वाले कहकर चाय ठुकरा देते हैं कि इसमें तो दूध और चीनी ही नहीं है।
तो हो यह रहा है कि ज्यादातर ऐसे योगी पुरुष कर्मयोग के नाम पर चाय और जीवन दोनों उबाले ही जा रहे हैं। भागदौड़ किए ही जा रहे हैं। कहानियां सुनाए जा रहे हैं। और चार में से तीन उन कहानियों के जवाब में अपनी चाय का उबाल और बता देते हैं। क्योंकि,
शे’र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो,
चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है।
— मुनव्वर राना
मैं सिर्फ इतना अर्ज़ कर रहा हूं कि सिर्फ इस बात के लिए आपको अज़ीम मकाम और बहुत इज्जत नहीं मिल सकती कि आप जीवन भर बहुत उबले हो। अगर आपका उबलना, अर्थात जीवन की भागदौड़, स्वास्थ्य देने वाली नहीं है, सिर्फ गैस बनाने वाली है, तो याद रहे मित्र, आपका होना सिर्फ हवा खराब कर सकता है। आपको खुद भी ऐसी चाय से सिर्फ एसिडिटी या उदर-वायु अर्थात गैस की समस्या होगी, जुबान पर एक कड़वाहट जमकर बैठ जाएगी और आप भूल जाएंगे कि इतनी आंच नहीं देनी थी।
चाय को चाय रहने दीजिए। उसे सिर्फ उबाल का शहीद-स्मारक मत बनाइए। उसमें पड़ने वाली बाकी चीजों पर भी ध्यान दीजिए। थोड़ा दूध बिना पानी वाला ले लीजिए, अर्थात जीवन का उद्देश्य थोड़ा शुद्ध रखिए। थोड़ा दूध बिना पानी वाला ले लीजिए, अर्थात जीवन का उद्देश्य बिना किसी पाप या कपट वाला बना लीजिए। बुद्ध जिसे सम्यक निश्चय, सम्यक चरित्र और उद्देश्य की पवित्रता कह सकते थे।
शक्कर थोड़ी ही रखिए। मिठास और लगाव, दोनों ज्यादा हों तो पीड़ा देते हैं। आदमी मिठास में इतना डूब जाता है कि फिर सच कड़वा लगने लगता है।
मसाले मौसम अनुसार डालिए। सर्दी हो तो अदरक, गर्मी हो तो इलायची और जेब इजाज़त दे तो केसर की एक पत्ती। हर मौसम में हर मसाला डालना जीवन नहीं, वैचारिक खिचड़ी है। हर आदमी को हर सलाह, हर किताब, हर गुरु, हर रणनीति और हर मोटिवेशनल वीडियो सूट नहीं करता। कुछ चीजें आपकी प्रकृति के लिए होती हैं, कुछ सिर्फ यूट्यूब थंबनेल के लिए।
और सबसे जरूरी बात: समय पर गैस बंद करना सीखिए।
यह बात चाय पर भी लागू होती है, प्रेम पर भी, महत्वाकांक्षा पर भी, तैयारी पर भी, बहस पर भी और दुख पर भी। हर चीज़ को अंतहीन उबालना परिपक्वता नहीं है। कई बार वह भीतर की अव्यवस्थित, हठी, आत्मपीड़क और गैस-निर्माता मूर्खता होती है।
तो बस इतना ही है, चाय का भी और अपना भी। बुद्ध की तरह मध्यम मार्ग देख लीजिए। संघर्ष कीजिए, पर संघर्ष से विवाह मत कर लीजिए। पीड़ा और दुख सबके जीवन में आते हैं। चाय बनाने में उबलना जरूरी है, लेकिन पीड़ा और दुख से ही पूरा प्रेम कर बैठना आवश्यक नहीं है। गीता ने कर्म कहा, लेकिन योगयुक्त कर्म कहा। उपनिषदों ने विवेक मांगा, केवल पसीना नहीं। जैन दर्शन ने संयम बताया, आत्मपीड़ा की प्रदर्शनी नहीं लगाई।
इसलिए मस्त रहिए। दुख और दर्द उतने ही मेहमान हैं, जितने बचपन, जवानी और बुढ़ापा। उन्हें बांधकर रोने मत बैठिए। उनका ढोल बजाने मत बैठिए। हर दुख को आत्मकथा का पहला अध्याय मत बनाइए। हर असफलता को तपस्या का प्रमाणपत्र मत बनाइए।
गैस बंद कर दीजिए।
थोड़ी देर में पतीला अपने आप ठंडा हो जाएगा। चाय पीने लायक होगी, स्वाद भी अच्छा आएगा।
(विचार पूर्णतः लेखक के मौलिक हैं; हिंदी व्याकरण की मरम्मत में AI ने श्रमदान किया है।)
Thank you
- D Ram
(भूतपूर्व राष्ट्रीय चाय दर्शन पार्टी के जिला संयोजक, विचारहीन उबालवाद विरोधी प्रकोष्ठ के संस्थापक अध्यक्ष, तथा गैस-जनित क्रांति के वैचारिक पीड़ित।)
